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Thursday, 1 October 2020

"स्त्री" एक शोषित पुष्प ("Lady " A Violated Flower) "


शब्द विहीन है आज लेखनी,

अश्रु विहीन हैं नेत्र,

ज्वार भाटा का केंद्र बना हृदय,

भावनाओं का सूखा स्त्रोत।

            पृथ्वी को हम माँ कहते हैं, 

            उसको भी हमने तिरस्कृत किया, 

            इक माँ के सन्मुख उसी की गोद में, 

             उसकी पुत्री को निर्वस्त्र किया।

नयन मूंदे, कर्ण बाधित हुए, 

ना देखा उन अमानुषों को, 

जो अट्टहास कर रोंद रहे थे, 

उसके नग्न निर्वस्त्र तन को। 

                  किसी ने ना उसकी पुकार सुनी, 

                  ना दर्द रुदन ने दिल दहलाया, 

                  अरे क्या यही है जो सभ्य राज्य का, 

                  सभ्य मानुष कहलाया। 

माँ, बहन, पुत्री, पत्नी,

सब रिश्ते कभी, 

मात्र ढकोसला लगते हैं, 

क्यूँ कि: 

थोड़े दिन सब याद रहेगा, 

मष्तिष्क पटल पर चित्रित रहेगा, 

भय है सब कितनीं "निर्भयाओं" को भूले, 

तुमको भी भूल जाएंगे। 

                     क्रूर कुटिल दानवी प्रवृत्तियां, 

                     इस धरती को लज्जित कर देंगी, 

                     तुम जैसी कितनी पुत्रियाँ, 

                     दिन के प्रकाश में रोंद कर, 

                    रात्री के अन्धकार में दहन होंगी। 

और वे निर्भीक, 

निर्भयता से कुकृत्य करेंगे, 

और भी निर्भय हो जाएंगे, 

और भी निर्भय हो जाएंगे। 

                       कलयुग के इस अंधकार में , 

                       शायद कोई कृष्ण बनेगा, 

                       कभी तो शायद आज की द्रौपदी की , 

                       चीत्कार सुनेगा, 

                       तब तक शब्द विहीन है लेखनी, 

                       अश्रु विहीन रहेंगे नेत्र। 



Tuesday, 25 August 2020

रात्रि का यह रूप और यौवन

आज श्री शरतचंद्र चट्टोपाध्याय जी द्वारा लिखित उपन्यास "शेष परिचय" पढ़ रही थी कि पंद्रह उपकरण के अंत में लिखा था " इतना उपन्यास लिखने के बाद शरद बाबू काल का ग्रास बन गए और उपन्यास को आगे बढ़ाने ऐवं पूरा करने का श्रेय सुप्रसिद्ध बंगला कथाकार राधारानी देवी को है। शरद बाबू उनसे प्रायः विचार विमर्श करते थे सो पाठकों को दो लेखकों की रचना होने जैसा कुछ भी प्रतीत नहीं होता" 

मैं विस्मित सी सोचती रही कि इन्हीं के समान मेरे और पूनम के सोच और लेखनी में कितनी समानता है।

शरद बाबू और राधारानी देवी से मैं अपनी और पूनम की तुलना कदापि नहीं कर रही। ऐसा करने की उद्दंडता और पाप तो मैं स्वप्न में भी नहीं कर सकती, परंतु मुझे इस बात का उत्तर जरूर मिल गया कि दूरी कितनी भी हो विचारों का मिलन दूभर नहीं।
प्रेषित कविता की चार पंक्तियाँ मैंने पुष्प के चित्र के साथ पूनम उनियाल भेजी, उसने सिलसिला आगे बढ़ा दिया और कविता को अंतिम रूप देकर मुझे अद्भुत मिलन की अनुभूति हुई।

रात्री का यह रूप और यौवन 


रात्रि का यह रूप और यह यौवन, 
सुबह होते ढल जाएगा, 
आओ अठखेलियाँ करें, 
हर्ष मनाएं इस मधुर मिलन का। 
चंचल, पुलकित, भाव विहगिमाओ से भरी,
अपने सौभाग्य पर हर्षित खिली खिली, 
नाचती कूदती आनंदित सी, 
पल पल अकुलाई संकुचाई सी। 
अपने आवेग के वेग मैं बह निकली, अचानक ठिठकी, और अचंभित सी सिहरी!
मोर नृत्य की भांति जो पड़ी नजर अपने पद चापो मैं, 
तो पता चला कहाँ से कहाँ बह चली इन राहों में!
तब कहती है कमलिनी अपनी अग्रज ज्योति पुंज से, 
अन्तराल यूँही बह निकला अपनी अन्जुलि से!
पता ही नहीं चला कब भोर हुई, 
पता नहीं चला कब भोर हुई, 
देखा यौवन ढल चुका था, 
जीवन इस अद्भुत नृत्य में, 
अपने को ही भूल चला था, 
पुष्प मतवाला अपनी मधुरिमा से, 
सबको उन्मादित कर चला गया।
कब जिम्मेदारियों में जीवन की रात्रि हुई,
कब भोर हुई यह अनुभूति ही नहीं हुई,
हे पुष्प तुझसे जीना सीख लिया,
अठखेलियाँ करना सीख लिया।

ज्योत्स्ना और पूनम 🤼‍♀️👭🤼‍♀️