Saturday, 28 February 2026

पीले पत्ते


 वृद्ध मनुष्य पीले पत्तों के समान होते हैं। निर्भर। क्यूँ कि हरे पत्तों के ऊपर पूर्णतः निर्भर होते हैं इसलिए तोड़ कर फेंक दिए जाते हैं। आज जब पीले पत्तों को तोड़ने के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि लगा वह कुछ बुदबुदाए।


धुंधलाई दृष्टि से नयनों ने, 

पीले पीले पत्तों को निहारा, 

विस्मृतिशील मस्तिष्क सोचे, 

बूटा मेरा अद्भुत प्यारा, 

ग्रहण लगाएं सुन्दरता को, 

पीले चितकबरे ये पत्ते, 

आज तो इनको तोंड़ दूं। 


          झुर्रियों भरे हाथ आगे बढ़े, 

          चितकबरे हाथों की कंपन देख, 

          उनपर झुर्रियों की झमाझम देख, 

          पत्ते मुस्काये कुछ व्यंग औ 'खुशी से, 

          हाथ थम गये हस्तब्ध थे। 

          

क्यों हो तुम मुस्काते इतना, 

संशय से विस्मित मैं पूछूं, 

क्यों है इतना व्यंग और खुशी, 

तुम्हारी मंद मंद मुस्कान में।   

      

             हंस कर बोले वे, 

             समत्व है साम्य है, 

             हम तुम में समतुल्यता है, 

             आभास नहीं क्या तुमको, 

             मनुष्य हो  बुद्धिमान हो, 

             गहन विचार कर सोचो।          


मत तोड़ो हम पीले पत्तों को, 

रंगीन बनाते दुनिया को हम, 

आज हरा कल पीला सबको होना है, 

बूटे से या संसार के विशाल वृक्ष से, 

टूट कर स्वतः सबको गिरना है, 

गहन विचार कर सोचो। 


       सकुचाए घबराये हाथ कंपकंपाए, 

       पीले पत्तों को बूटे के अंक में छोड़, 

       किशमिश के समान, 

       समय की रेखाओं से अंकित, 

       चेहरे पर टिके गए, 

       गहन चिंतन में मग्न हो गए। 

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   ज्योत्स्ना पंत      

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